हमारे बारे में
लोधा समाज इंदौर का उद्देश्य, उसकी परंपरा, और वे दो नाम जिनसे समाज अपनी पहचान लेता है।
हमारा उद्देश्य
लोधा समाज इंदौर का उद्देश्य समाज के जन-जन तक सेवा सहायता एवं मार्गदर्शन पहुचाना है। लोधा समाज इंदौर सदैव अपने समाज के सदस्यों की प्रगति हेतु नवीनतम टेक्नोलॉजी अपनाने का पक्षधर रही है। लोधा समाज इंदौर वेब-पोर्टल के द्वारा समाजजनों को जोड़ना जिससे समाज संगठित हो सके और आपस में संपर्क स्थापित कर सके ,और इस वेब-पोर्टल के द्वारा इस तरह की सेवाए दी जा रही है, जिसमे लोधा समाज के सदस्यों के पारिवारिक परिवेश को ध्यान में रखते हुए समाज द्वारा संचालित वेब-पोर्टल के माध्यम से बच्चों की पढ़ाई-लिखाई, उनके करियर एवं व्यावसायिक ट्रेनिंग, आदि कोर्स करने की प्रेरणा एवम सहायता देना साथ ही मेडिकल सुविधाएँ एवं ब्लड-बैंक के माध्यम से आवश्यकता पड़ने पर उन्हें सहायता उपलब्ध कराना, ऐसे सेवा कार्य किये जायेंगे। साथ ही ऐसे सक्षम समर्थ लोधी बंधु जो इस तरह के सेवा कार्यों में लोधा समाज के माध्यम से सेवा देना चाहते है वे सहर्ष आमंत्रित है।
हमारी परंपरा
हर वर्ष नवरात्र में लोधा समाज इंदौर नवदुर्गा महोत्सव, विजयादशमी महोत्सव तथा नगर कन्या भोज एवं विशाल भंडारे का आयोजन करता है। ये आयोजन महाराणा प्रताप चौराहा, महूनाका, इंदौर में होते हैं और समाज के परिवारों के सहयोग से संभव होते हैं।
कार्यक्रमों की जानकारी कार्यक्रम पृष्ठ पर तथा सहयोग करने वालों के नाम दान पृष्ठ पर देखे जा सकते हैं।
रानी अवंती बाई लोधी
रानी अवंती बाई लोधी भारत के प्रथम स्वाधीनता संग्राम सन् 1857 में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली प्रथम महिला शहीद वीरांगना थी।
वीरांगना रानी अवंती बाई लोधी का जन्म 16 अगस्त 1831 को ग्राम मनकेहणी जिला सिवनी मध्यप्रदेश में हुआ था। इनकी माता का नाम कृष्णा बाई व पिता का नाम राव जुझार सिंह था । इनके पिता जमींदार थे। बाल्यावस्था से ही वीर तथा साहसी अवंती बाई ने बचपन से ही तलवारबाजी और घुड़सवारी सीख लिया था। अवंती बाई का विवाह रामगढ़ रियासत के राजा लक्ष्मण सिंह के पुत्र विक्रमादित्य सिंह के साथ हुआ। पिता के निधन के बाद विक्रमादित्य सिंह राजा बने। राजा विक्रमादित्य सिंह के अस्वस्थता के फलस्वरुप राज्य संचालन का उत्तरदायित्व राजकार्य में पारंगत उनकी पत्नी रानी अवंती बाई लोधी ने संभाला, इनके दो पुत्र हुए अमान सिंह और शेर सिंह।
गवर्नर जनरल डलहौजी के हड़प नीति के तहत विक्रमादित्य सिंह को अयोग्य और इनके दोनों पुत्रों को नाबालिग घोषित कर रामगढ़ रियासत से कोर्ट आफ वार्ड्स के कब्जे में लेकर ब्रिटिश अधिकारी नियुक्त किए गए। रानी अवंती बाई लोधी ने इन अधिकारियों को रामगढ़ से बाहर निकाल दिए और शासन का संचालन स्वयं किए। रानी ने कृषकों को अंग्रेजों के कर संबंधी निर्देशों को ना मानने का आदेश दिया। इस सुधार कार्य से क्षेत्र में रानी की लोकप्रियता बढ़ी।
मई 1857 में प्रथम भारतीय स्वाधीनता संग्राम प्रारंभ होने पर रानी अवंती बाई लोधी ने ब्रिटिश शासन के विरूद्ध संगठित होकर मातृभूमि को ब्रिटिश शासन को मुक्त करने, क्रांति का संदेश देने तथा स्वाभिमान जागृत करने राजाओ जमींदारों और माल गुजारो को पत्र इस प्रकार लिखे मातृभूमि की रक्षा के लिए अंग्रेजों से संघर्ष के लिए तैयार रहे या चूड़ियाँ पहनकर घरों में बैठे रहे…..
रानी अवंती बाई लोधी ने चार हज़ार सैनिकों की सेना संगठित की और स्वयं उसका नेतृत्व किया। सन् 1857 में मंडला के निकट खैरी ग्राम में हुए युद्ध में रानी की सेना ने अंग्रेज़ अधिकारी वॉडिंग्टन की फ़ौज को पराजित किया और अंग्रेज़ मंडला छोड़कर पीछे हट गए।
कुछ समय पश्चात् अंग्रेज़ों ने रीवा राज्य की सहायता लेकर रामगढ़ पर आक्रमण किया और रामगढ़ को आग के हवाले कर दिया। रानी अवंती बाई लोधी देवहारगढ़ की पहाड़ियों के घने जंगलों में पहुँचीं और वहाँ से छापामार युद्ध के द्वारा अंग्रेज़ी सेना को लगातार क्षति पहुँचाती रहीं।
20 मार्च 1858 को, चारों ओर से घिर जाने पर, रानी अवंती बाई लोधी ने अंग्रेज़ों के हाथ पड़ने के स्थान पर अपनी ही तलवार से स्वयं का बलिदान कर दिया। उस समय उनकी आयु केवल 26 वर्ष थी। रामगढ़ रियासत अंग्रेज़ों के अधिकार में चली गई, परंतु रानी का यह बलिदान आज भी समाज और देश के लिए प्रेरणा है। 20 मार्च उनका बलिदान दिवस माना जाता है।
भारतीय डाक विभाग ने उनके सम्मान में 20 मार्च 1988 तथा 19 सितम्बर 2001 को डाक टिकट जारी किए। जबलपुर के निकट नर्मदा नदी पर बने बरगी बाँध की परियोजना को “रानी अवंती बाई लोधी सागर परियोजना” नाम दिया गया है, और रामगढ़ में उनकी स्मृति में उद्यान तथा अश्वारूढ़ प्रतिमा स्थापित है।
स्वामी ब्रह्मानंद लोधी जी
भारत वीरो की भूमि है. यहां हर दशक मे अनेक समाजसेवी वीरो ने जन्म लिया है तथा समाज के उत्थान में अपना योगदान दिया है. ऐसे ही समाजसेवी में एक बड़ा नाम स्वामी ब्रह्मानंद लोधी जी का आता है. स्वामी ब्रम्हानंद जी का जन्म आज से लगभग 125 वर्ष पहले उत्तरप्रदेश हमीरपुर जिले की राठ तहसील के बरहरा गाँव मे एक साधारण किसान परिवार मे हुआ था. स्वामी ब्रम्हानंद के बचपन का नाम शिवदयाल था. स्वामी ब्रम्हानंद ने बचपन से ही समाज में फैले अंधविश्वास और अशिक्षा जैसी कुरीतियों का डटकर विरोध किया तथा शिक्षा के क्षेत्र मे बहुत ही सराहनीय कार्य किये. स्वामी जी ने समाज के लोगों को शिक्षा की ओर ध्यान देने हेतु आह्वान किया.
स्वामी ब्रह्मानंद जी की प्रारम्भिक शिक्षा हमीरपुर में ही हुई. इसके पश्चात् स्वामी ब्रह्मानंद जी ने घर पर ही महाभारत, गीता, रामायण, उपनिषद और अन्य शास्त्रों का अध्ययन किया. इसी कारण लोग उन्हें स्वामी ब्रह्मानंद के नाम से बुलाने लगे. ऐसा भी कहा जाता है कि बालक शिवदयाल के बारे में संतों ने भविष्यवाणी कि थी कि यह बालक या तो राजा होगा या प्रख्यात संन्यासी.
बचपन से बालक शिवदयाल का रुझान आध्यात्मिकता की तरफ ज्यादा होने के कारण पिता को डर सताने लगा कि कहीं वे साधु न बन जाएं. इस डर से पिता ने स्वामी ब्रह्मानंद का विवाह सात वर्ष की उम्र में हमीरपुर के ही गोपाल महतो की पुत्री राधाबाई से करा दिया. आगे चलकर राधाबाई ने एक पुत्र और एक पुत्री को जन्म दिया. विवाह के उपरांत भी स्वामी जी का चित्त आध्यात्मिकता की तरफ ही था. इसकारण स्वामी ब्रह्मानंद जी ने 24 वर्ष की आयु में पुत्र और पत्नी का मोह त्याग दिया एवं गेरुए वस्त्र धारण कर परम पावन तीर्थ स्थान हरिद्वार में भागीरथी के तट पर ‘‘हर की पैड़ी’’ पर 24 वर्ष की आयु मे संन्यास की दीक्षा ली. संन्यास के बाद शिवदयाल लोधी संसार में ‘‘स्वामी ब्रह्मानंद’’ के रूप में प्रख्यात हुए.